Tuesday, October 17, 2017

बुरांस के फूल

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बसंत और फूल एक दूसरे के पूरक हैं.जहां फूल हैं, वहां बारहों महीने बसंत है. बसंत है, तो फूल हैं. फूल बसंत ऋतु के द्योतक है.वनों को प्रकृति का श्रृंगार कहा जाता है.वनों के श्रृंगार से आच्छादित प्रकृति बसंत ऋतु में रंग-बिरंगे फूलों के नायाब गहनों से सज-संवर जाती है. फूलों का यह गहना प्रकृति के सौंदर्य में चार चांद लगा देता है. फूल को सौन्दर्य, कमनीयता, प्रेम, अनुराग और मासूमियत का प्रतीक माना जाता है. फूल का रंग उसकी सुन्दरता को बढा़ता है. प्रकृति के हरे परिवेश में सूर्ख लाल रंग के फूल खिल उठे हों तो यह दिलकश नजारा हर किसी का मन मोह लेता है.

उत्तराखण्ड के हरे-भरे जंगलों के बीच चटक लाल रंग के बुरांस के फूलों का खिलना पहाड़ में बसंत ऋतु के यौवन का सूचक है. बसंत के आते ही पहाड़ के जंगल बुरांस के सूर्ख लाल फूलों से मानो लद जाते हैं. बुरांस बसन्त में खिलने वाला पहला फूल है बुरांस धरती के गले को पुष्पाहार से सजा सा देता है. बुरांस के फूलने से प्रकृति का सौंदर्य निखर उठता है.
बुरांस का पेड़ उत्तराखंड का राज्य वृक्ष है, तथा नेपाल में बुरांस के फूल को राष्ट्रीय फूल घोषित किया गया है। गर्मियों के दिनों में ऊंची पहाड़ियों पर खिलने वाले बुरांस के सूर्ख फूलों से पहाड़ियां भर जाती हैं. हिमाचल प्रदेश में भी यह काफी पाया  जाता है.
उत्तराखण्ड के हरे-भरे जंगलों के बीच चटक लाल रंग के बुरांस के फूलों का खिलना पहाड़ में बसंत ऋतु के यौवन का सूचक है.बसंत के आते ही पहाड़ के जंगल बुरांस के सूर्ख लाल फूलों से मानो लद जाते हैं.बुरांस बसन्त में खिलने वाला पहला फूल है.बुरांस के खिलते ही धरती के गले को मानो पुष्पाहार सा मिल जाता है. बुरांस के फूलने से प्रकृति का सौंदर्य निखर उठता है.एक गढ़वाली लोकगीत में इसकी जीवंतता दिखाई देती है....

फूलों की हंसुली

पय्याँ ,धौलू ,प्योंली,आरू
लया फूले बुरांस

(पदम्,धौलू,प्योंली,आड़ू ,सरसों और बुरांस के फूल इस तरह खिले हुए हैं जैसे कोई दरांती हो)

बुरांस जब खिलता है तो पहाड़ के जंगलों में बहार आ जाती है. घने जंगलों के बीच अचानक चटक लाल बुराँस के फूल के खिल उठने से जंगल के दहकने का भ्रम होता है. जब बुराँस के पेड़ लाल फूलों से ढक जाते हैं तो ऐसा आभास होता है कि मानो प्रकृति ने लाल चादर ओढ़ ली हो. बुराँस को जंगल की ज्वाला भी कहा जाता है. उत्तराखण्ड के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में बुराँस की महत्ता महज एक पेड़ और फूल से कहीं बढ़कर है. बुराँस उत्तराखण्ड के लोक जीवन में रचा-बसा है. बुराँस महज बसंत के आगमन का सूचक नहीं है, बल्कि सदियों से लोक गायकों, लेखकों, कवियों, घुम्मकड़ों और प्रकृति प्रेमियों की प्रेरणा का स्रोत रहा है. बुराँस उत्तराखण्ड के हरेक पहलु के सभी रंगों को अपने में समेटे है.

सौंदर्य के प्रतीक इन पुष्पों का दर्शन नारी को भी सुंदर एवं आकर्षक बनने के लिए प्रोत्साहित करता है.एक प्रेयसी इन पुष्पों की कमनीयता पर इतना आकृष्ट हो जाती है कि अपने प्रेमी से अपने लिए बुरांस प्रसून की भांति चित्ताकर्षक परिधान की कामना करती है.......
मेरा विमरैल को जागो सी देवे 
बुरांस फूल को जामो सी 

(बुरांस के रक्त वर्ण के फूलों जैसे रंग के परिधान )
हिमालय के अनुपम प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन, प्रियसी की उपमा, प्रेमाभिव्यक्ति, मिलन हो या विरह सभी प्रकार के लोक गीतों की भावाभिव्यक्ति का माध्यम बुराँस है. उत्तराखण्ड के कई लोक गीत बुराँस के इर्द-गिर्द रचे गये है. विरह गीतों की मुख्य विषय-वस्तु बुराँस ही है. पहाड़ में बुराँस के खिलते ही कई भूले-बिसरे लोक गीत एकाएक स्वर पा जाते है-
उ कुमू य जां एक सा द्यूं प्यार सवन धरती मैं,
उ कुमू य जां कुन्ज, बुंरूस, चम्प, चमेलि, दगडै़ फुलनी

बुराँस का खिलना प्रसन्नता का द्योतक है. बुराँस का फूल यौवन और आशावादिता का सूचक है. प्रेम और उल्लास की अभिव्यक्ति है. बुराँस का फूल मादकता जगाता है. बुराँस का गिरना विरह और नश्वरता का प्रतीक है. बुराँस रहित जंगल कितने उदास और भावशून्य हो जाते है. इस पीडा़ को लोकगीतों के जरिये बखूबी महसूस किया जा सकता है.  बसन्त ऋतु में जंगल को लाल कर देने वाले इस फूल को देखकर नव विवाहिताओं को मायके और रोजी-रोटी की तलाश में पहाड़ से पलायन करने को अभिशप्त अपने पति की याद आ जाती है. अपने प्रियतम् को याद कर वह कहती है-
 अब तो बुरांश भी खिल उठा है, पर तुम नहीं आए
बुरांस के फूल में हिमालय की विराटता है. सौंदर्य है. शिवजी की शोभा है. पार्वती की झिलमिल चादर है. शिवजी सहित सभी देवतागण बुराँस के फूलों से बने रंगों से ही होली खेलते है. बुराँस आधारित होली गीत लोक जीवन में बुराँस की गहरी पैठ को उजागर करता है-

बुरूंसी का फूलों को कुम-कुम मारो,
डाना-काना छाजि गै बसंती नारंगी
पारवती ज्यूकि झिलमिल चादर,
ह्यूं की परिन लै रंगै सतरंगी

बुरांस ने लाल होकर भी क्रान्ति के गीत नहीं गाए. वह हिमालय की तरह प्रशंसाओं से दूर एक आदर्शवादी बना रहा. फिर भी बुरांस ने लोगों को अपनी महिमा का बखान करने पर मजबूर किया है. बुराँस ने लोक रचनाकारों को कलात्मक उन्मुक्तता, प्रयोगशीलता और सौंदर्य बोध दिया. होली से लेकर प्रेम, सौंदर्य और विरह सभी प्रकार के लोक गीतों के भावों को व्यक्त करने का जरिया बुराँस बना.
पहाड़ के लोक गीतों में सबसे ज्यादा जगह बुराँस को ही मिली है. एक पुराने कुमाऊँनी लोक गीत में जंगल में झक खिले बुराँस को देख मां को ससुराल से अपनी बिटिया के आने का भ्रम होता है. वह कहती है –

'वहां उधर पहाड़ के शिखर पर बुरूंश का फूल खिल गया है. मैं समझी मेरी प्यारी बिटिया हीरू आ रही है. अरे! फूले से झक-झक लदे बुरूंश के पेड़ को मैंने अपनी बिटिया हीरू का रंगीन कपडा़ समझ लिया.'

एक कवि नायिका के होठों की लालिमा का जिक्र करते हुए कहता है –

चोरिया कना ए बुरासन आंठे तेरा नाराणा

(बुराँश के फूलों ने हाय राम तेरे ओंठ कैसे चुरा लिये)

संस्कृत के अनेक कवियों ने बुराँस की महिमा को लेकर श्लोकों की रचना की है।

सुमित्रा नन्दन पंत भी बुराँस के चटक रंग से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके. उन्होंने बुराँस पर कुमाऊँनी कविता लिखी थी –

सल्ल छ, दयार छ, पई छ, अंयार छ
सबनाक फागन में पुग्नक भार छ
 पे त्वी में ज्वानिक फाग छ
रंगन में त्यार ल्वे छ
प्यारक खुमार छ

(जंगल में साल है, देवदार है, पईया है, और अयार समेत विभिन्न् प्रजातियों के पौधें है. सबकी शाखाओं में कलियों का भार है. पर तुझमें जवानी का फाग है. तेरे रंगों में लौ है, प्यार का खुमार है)

पहाड़ के रोजमर्रा के जीवन में बुराँस किसी वरदान से कम नहीं है. बुराँस के फूलों का जूस और शरबत बनता है. इसे हृदय रोग और महिलाओं को होने वाले सफेद प्रदर रोग के लिए रामबाण दवा माना जाता है. बुराँस की पत्तियों को आयुर्वेदिक औषधियों में उपयोग किया जाता है. बुराँस की लकडी़ स्थानीय कृषि उपकरणों से लेकर जलावन तक सभी काम आती है. चौडी़ पत्ती वाला वृक्ष होने के नाते बुराँस जल संग्रहण में मददगार है. पहाडी़ इलाकों के जल स्रोतो को जिंदा रखने में बुराँश के पेड़ों का बडा़ योगदान है। इनके पेड़ों की जड़ें भू-क्षरण रोकने में भी असरदार मानी जाती है. बुराँस का खिला हुआ फूल करीब एक पखवाड़े तक अपनी चमक बिखेरता रहता है. बाद में इसकी एक-एक कर पंखुड़िया जमीन पर गिरने लगती है.पलायन के चलते वीरान होती जा रही पहाड़ के गाँवों की बाखलियों की तरह.

लेकिन दुर्भाग्य से पहाड़ में बुराँस के पेड़ तेजी के साथ घट रहे हैं. अवैध कटाई के चलते कई इलाकों में बुराँस लुप्त होने के कगार पर पहुँच गया है. नई पौधें उग नहीं रही हैं. जानकारों की राय में पर्यावरण की हिफाजत के लिए बुराँस का संरक्षण जरूरी है. अगर बुराँस के पेड़ों के कम होने की मौजूदा रफ्तार जारी रही तो आने वाले कुछ सालों के बाद बुराँस खिलने से इंकार कर देगा. नतीजन आत्मीयता के प्रतीक बुरांस के फूल के साथ पहाड़ के जंगलों की रौनक भी खत्म हो जाएगी. बुरांस सिर्फ पुराने लोकगीतों में ही सिमट कर रह जाएगा. बसंत ऋतु फिर आएगी.फिर किसी पहाड़ी युवती  के स्वर फूटेंगे.......

मेरा मैत्यों का डांडा बुरांस फूल्यां
हिलासी जाण दे मैत

(मेरे मायके में बुरांस के फूल खिले हुए होंगे इसलिए हे पक्षी हिलांसी,मुझे अपने मायके जाने दे.)

Tuesday, October 10, 2017

जीवन की दिशा

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स्ट्राउड
व्यक्तियों के जीवन में कई पल ऐसे भी आते हैं जहाँ से उसके जीवन की दिशा ही बदल जाती है.ऐसा कई प्रमुख और नामचीन व्यक्तियों के साथ हुआ है.अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को की खाड़ी का एक छोटा सा द्वीप ‘अलकेटराज’ जो बंद मुट्ठी के आकर का है,पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है .इसका स्पेनी भाषा में अर्थ है-सारस. पहले यहाँ एक कारागार हुआ करता था जिसमें खतरनाक बंदी रखे जाते थे.

हाँ बंद कई खतरनाक कैदियों ने 2 मई 1946 को विद्रोह कर दिया.कुछ बंदियों ने पहरेदारों पर आक्रमण कर उसे बंदी बना लिया और उससे चाबियाँ छीन कर अपने साथियों को छुड़ा लिया.लेकिन एक बंदी ऐसा भी था जिसने जिसने इस विद्रोह में भाग लेने से इनकार कर दिया.ऊँचे-पूरे हरी आँखों वाले इस 56 वर्षीय बंदी का नाम था – रॉबर्ट एफ. स्ट्राउड.

      अलकेटराज का कारागार 
स्ट्राउड को एक झगड़े मेंएक व्यक्ति को गोली मार देने के आरोप में बारह वर्ष के कैद की सजा हुई थी.जब वह कनास के लेनवर्थ कारागार  में बंदी था तो वहां के क्रूर पहरेदार को चाकू मारकर हत्या करने के आरोप में फांसी की सजा पाकर अपने जीवन के अंतिम दिन गिन रहा था.बाद में अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विलसन ने उसके प्राणदंड को आजीवन कारावास में बदल दिया था.इस तरह स्ट्राउड मौत के मुंह में जाते-जाते जीवन की बांहों में लौट आया था.

जीवनदान मिलने के बाद स्ट्राउड ने आत्मचिंतन किया और पाया कि अपने क्रूर और शराबी पिता के कारण ही वह चिड़चिड़ा और आक्रामक बन गया था.उसकी मां के साथ विश्वासघात कर उसके पिता ने उन दोनों को छोड़ दिया था. स्ट्राउड ने अब भले व्यक्तियों की भांति जीवन बिताने का निश्चय किया .वह अपनी कोठरी में ग्रीटिंग कार्ड चित्रित करता और मां के माध्यम से बाजार में बिकने के लिए भेज देता.

चानक 1920 में उसके जीवन में एक परिवर्तन आया. स्ट्राउड ने देखा कि व्यायाम के लिए बने अहाते में चिड़ियों का एक घोंसला है,जिसमें नन्हें नन्हें बीमार बच्चे हैं. स्ट्राउड उन बीमार बच्चों को अपनी कोठरी मरण ले आया और शाकाहारी सूप में ब्रेड के टुकड़े-टुकड़े भिगो-भिगो कर उन्हें खिलने लगा.शीघ्र ही ये बच्चे स्वस्थ हो गए.

स्ट्राउड के जीवन को अब एक नयी दिशा मिल गयी.उसने कारागार के पुस्तकालय में उपलब्ध पक्षियों की आदतों से संबंधित पुस्तकों को पढ़ना शुरू किया.वह चोरी छिपे कुछ अपनी कोठरी मरण कुछ पक्षी भी ले आता. धीरे – धीरे पक्षियों के संबंध में उसका ज्ञान बढ़ता गया.अब वह बीमार पक्षियों की चिकित्सा करने में भी दक्ष हो गया.धीरे-धीरे उसकी कोठरी ‘पक्षियों का अस्पताल ही बन गया.

स्ट्राउड की किताब 
जेल अधिकारियों ने भी उसे प्रोत्साहित किया और इसी के फलस्वरूप स्ट्राउड पक्षियों के संबंध में एक ज्ञानवर्द्धक पुस्तक लिखने में भी सफल हुआ.1943 में प्रकाशित उसकी इस पुस्तक का नाम था ‘डाईजेस्ट ऑन दी डिसिसेस ऑफ़  बर्ड्स’.इसमें उसके द्वारा बनाए गए पक्षियों के चित्र भी थे.समय बीते के साथ ही स्ट्राउड की ख्याति पक्षी विशेषज्ञ के रूप में होती गयी.एक दिन ‘अमेरिकी फेडरल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन’ के प्रमुख एक्गर हूवर ने उससे मुलाकात की और अपनी मां को भेंट देने के लिए पक्षी का एक चित्र भी खरीदा.

स्ट्राउड का जीवन शांति पूर्वक बीत रहा था,तभी कारागार में अन्य बंदियों के विद्रोह के दौरान उसने बंदियों को समझाने की कोशिश की एवं घायल बंदियों की सेवा भी की .

कारागार में ही 1963 में स्ट्राउड की की मृत्यु हो गयी .परिस्थितिवश स्ट्राउड से कुछ गलतियाँ हुई थी लेकिन विवेक ने उसका साथ नहीं छोड़ा,इसलिए कारागार में रहते हुए भी उसके जीवन को एक नई दिशा मिल गयी.

Saturday, September 30, 2017

कौरवों की पूजा

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पोखू देवता का मंदिर 
महाभारत के पांडवों की सामजिक-सांस्कृतिक मान्यता तो स्वयं ही सिद्ध है ही लेकिन इस देश में ऐसे भी मंदिर हैं जहाँ कौरवों की पूजा की जाती है.देहरादून से कुछ सौ किलोमीटर दूर तमसा नदी के तट पर नेटवार गाँव है  जिसके बीचोबीच पोखू देवता का मंदिर है .तमसा नदी के संबंध में यह मान्यता है कि कुरुक्षेत्र के युद्ध में दुर्योधन के मारे जाने के बाद वहां के स्थानीय निवासी इतना रोये कि उनके आंसुओं ने एक नदी का रूप धारण कर लिया.तमस का अर्थ दुःख भी होता है और आज भी इस नदी का पानी पीने के काम में नहीं लाया जाता.स्थानीय मान्यता है कि आज भी आंसू बह रहे हैं.नेटवार गाँव के निवासी अपने को दानवीर कर्ण का वंशज मानते हैं.

इसके समीप देवरा गाँव में राजा कर्ण का मंदिर है.मकर संक्रांति पर मंदिर के पास में घटोत्कच का मेला लगता है.इसमें गाय की खाल में पत्थर भरकर एक बड़ी गेंद बनायी जाती है  जिसे घटोत्कच का नाम दिया जाता है.

लगभग तीसरे पहर आस-पास के गाँव के लोग सज-धज कर नए कपड़े पहनकर मेले में आते हैं.बाजों गाजों के शोर के बीच दो टोलियाँ जिन्हें कौरवों और पांडवों का नाम दिया जाता है खड़ी हो जाती हैं.जब पुजारी उस गेंद को मैदान में फेंकता है तो दोनों टोलियों के बीच उसे लपकने के लिए धक्का-मुक्की होती है.

कहते हैं कि महाभारत के युद्ध में भीम का पुत्र घटोत्कच कर्ण के हाथों मारा गया था.शायद इसी से उस गेंद को घटोत्कच का नाम देकर कर्ण के मंदिर में इधर से उधर  फेंककर एक प्रकार से घटोत्कच को अपमानित किया जाता है.खेल की धक्का-मुक्की में कई लोगों को चोटें आ जाती है.खेल के ख़त्म होने के संकेत पर गेंद जिस टीम के सदस्य के हाथ में होती है उसे विजयी घोषित कर दिया जाता है.

देवरा गाँव के आसपास के बहुत बड़े इलाके में अभी भी राजा कर्ण का राज माना जाता है तथा लोगों के झगड़ों को निबटाने का काम राजा कर्ण के नाम पर मंदिर का पुजारी करता है.राजा कर्ण के तीन सहायक देवता पोखू,शल्य और रेनुका नाम से जाने जाते हैं.पोखू देवता का मंदिर पुराने नेटवार  गाँव में रूपिन और सूपिन नदियों के संगम पर बना है और उसकी बनावट कर्ण के मंदिर जैसी ही है.

पोखू एक सख्त देवता माना जाता है जो चोरी आदि करने पर सख्त सजा देता है.शायद इसलिए इस इलाके में अपराधों का नामोनिशान नहीं है.पोखू देवता इतना भयानक बताया जाता है कि कोई भी उसकी ओर देखता नहीं,यहाँ तक कि पुजारी भी उसकी आरती उसकी ओर पीठ करके ही करता है.

नेटवार से आगे डाटमीर  और गंगर गाँवों में दुर्योधन देवता के मंदिर हैं और उसकी पूजा भी होती है.ओसला में भी दुर्योधन का सुंदर मंदिर है.दुर्योधन का सबसे बड़ा मंदिर उत्तरकाशी में जखोल में है.

Saturday, September 23, 2017

खिलते हैं फूल पाँव के ठोकर से


पुरातात्विक भग्नावशेषों में मथुरा से प्राप्त ईसा की दूसरी शती की कुषाण कालीन युवती की प्रस्तर प्रतिमा के पार्श्व में अशोक का फूला हुआ पेड़ उत्कीर्ण है और वह युवती अपने पाँव से उस पेड़ की जड़ पर प्रहार कर रही है.इस प्रक्रिया को अशोक दोहद के नाम से जाना जाता है.बोधगया,साँची,भरहुत,संहोल आदि में प्राप्त प्रतिमाओं में भी अशोक दोहद की प्रक्रिया उत्कीर्ण है.ये प्रतिमाएं हमें उस काल के कला-साहित्य और जन-जीवन से परिचित कराती हैं.

वृक्ष दोहद शब्द वृक्ष विशेष की अभिलाषा का द्योतक है. हमारी संस्कृति में माना जाता है कि वृक्ष विशेष भी कुछ अभिलाषा रखते हैं. वृक्ष दोहद की पूर्ति जनकल्याण के लिए किसी युवती की क्रिया विशेष से होती है. वैदिक साहित्य, रामायण, महाभारत संस्कृत-प्राकृत के नाटकों और काव्यों रीति काव्यों तथा लोकगीतों में वृक्ष दोहद का खूब वर्णन है.

भारतीय संस्कृति में यह मान्यता है कि वृक्ष विशेष की भी यह इच्छा होती है कि उसके फूलने-फलने की उम्र यानी युवावस्था में कोई नारी उस को स्पर्श करे, उसे हाथ से थाप दे या पैर से प्रहार करे. इसी कारण भारतीय साहित्य में युवतियों का भी उपवन वाटिका या उद्यान से प्रेम प्रदर्शन का वर्णन है. उद्यान क्रीड़ा के विभिन्न स्वरूप प्राचीन काल में नारियों के मनोरंजन का प्रिय साधन थे. माना जाता था कि जैसे वृक्ष नारी स्पर्श की आकांक्षा रखते हैं वैसे ही नारियाँ भी वृक्षों संग क्रीड़ा कर उतनी ही आनंदित होती थी. इससे दोनों का स्वास्थ्य और सौंदर्य बना रहता था. इसी प्रचलित लोक विश्वास को संस्कृत कवियों ने अपने साहित्य में भी स्थान दिया है.

 'मालविकाग्निमित्रम' से पता चलता है कि मदन उत्सव के बाद अशोक में दोहद उत्पन्न किया जाता था। यह दोहद क्रिया इस प्रकार होती थी- कोई सुंदरी सब प्रकार के आभूषण पहनकर पैरों में महावर लगाकर और नूपुर धारण कर बाएँ चरण से अशोक वृक्ष पर आघात करती थी. इस चरणाघात की विलक्षण महिमा थी. अशोक वृक्ष नीचे से ऊपर तक पुष्पस्तवकों (गुच्छों) से भर जाता था. कालिदास ने 'मेघदूतम' में लिखा है कि दोहद एक ऐसी क्रिया है जो गुल्म, तरु, लतादि में अकाल पुष्प धारण करने की दिशा में द्रव्य का कार्य करता है. मेघदूतम में ही उन्होंने लिखा है कि वाटिका के मध्य भाग में लाल फूलों वाले अशोक और बकुल के वृक्ष थे, एक प्रिया के पदाघात से और दूसरा वदन मदिरा से उत्फुल्ल होने की आकांक्षा रखता था. 'नैषधीयचरितम' में उल्लेख है कि दोहद ऐसे द्रव्य या द्रव्य का फूक है जो वृक्षों एवं लता आदि में फूल और फल देने की शक्ति प्रदान करता है.

भारतीय साहित्य में अलग-अलग वृक्ष, लता, गुल्म आदि को ध्यान में रखकर प्रियंगु दोहद, बकुल दोहद, अशोक दोहद, कुरबक दोहद, मंदार दोहद, चंपक दोहद, आम्र दोहद, कर्णिकार दोहद, नवमल्लिका दोहद आदि की कल्पना की गई है. भारतीय कला विशेष कर शुंगकालीन कला में उद्यान क्रीड़ा के स्वरूपों में शाल भंजिका, आम्र भंजिका, सहकार भंजिका के रूप प्रदर्शित किए गए हैं.

वृक्ष दोहद के स्वरूप आज भी लोक परंपराओं में देखे जा सकते हैं. भोजपुरी समाज में दोहद की इस क्रिया को अकवार देना कहा जाता है। ऐसी मान्यता है की पूर्णरूप से विकसित वृक्ष जब फल-फूल नहीं दे रहा हो तो कोई युवती जब शृंगार कर उसे दोनों हाथों से पकड़ लेती और उसके साथ एक विशेष क्रिया करती है तो वह वृक्ष ज़रूर फूल-फल देने लगता है. यही नहीं वृक्षों और पौधों की शादी की भी परंपरा रही है. तुलसी, आम, आँवला, कटहल, कनैल आदि पौधों तथा वृक्षों के विवाह विधिवत किए जाते हैं ताकि वह अच्छे ढंग से फूल-फल सके.

भोजपुरी समाज में दोहद के कई और रूप देखने को मिलते हैं। इनमें से एक को हरपरौरी कहा जाता है. जब किसी वर्ष वर्षा नहीं होती है पूर्णत: अकाल के लक्षण दिखने लगते हैं तब औरतें हरपरौरी का आयोजन करती हैं. इस परंपरा के अनुसार रात्रि में औरतें गाँव से बाहर निर्जन स्थान में स्थित खेत में इकट्ठा होती हैं. उस स्थान पर औरतों द्वारा काली माता, शीतला माँ, आदि सप्तमातृकाओं का गीत गाया जाता है. उसके बाद दो औरतें झुककर बैल बनने का स्वांग करती हैं और एक औरत किसान के रूप में होती है उन बैल बनी औरतों के कंधों पर जुआठ रखी जाती है और किसान का अभिनय कर रही औरत हल की मूठ सँभालती है. अब खेत में हल चलना शुरू होता है. किसान का अभिनय कर रही औरत गाँव के किसी प्रधानव्यक्ति का नाम लेकर चिल्लाकर कहती है कि हम लोग यहाँ मर रहे हैं और उसके द्वारा पानी नहीं दिया जा रहा है. इस दौरान शेष औरतें वरुण देव का आवाहन कर के गीत गाती हैं .

मान्यता है कि औरतें हरपरौरी क्रिया में जब खेतों में हल चला देती हैं तो वर्षा अवश्य होती है. फसल लहलहाने लगती है और सूखे की समस्या ख़त्म हो जाती है. इसी तरह झारखंड के जनजातीय क्षेत्रों में अकाल की स्थिति में औरतें प्रातः स्नान करके जितिया वृक्ष के जड़ में एक लोटा जल डालती हैं और भगवान से पानी की वर्षा करने का आग्रह करती हैं. विश्वास किया जाता है कि ऐसा करने पर ज़रूर वर्षा होती है. इसके अतिरिक्त उत्तर प्रदेश और बिहार में नए कूप और बावली के विवाह की भी परंपरा है. कूप और बावली भले ही मानव द्वारा निर्मित हों लेकिन वह हमारे पर्यावरण के अंग हैं और प्रकृति संग एकाकार होते हैं. माना जाता है कि इन कूप और बावलियों को भी मादा संसर्ग की आकांक्षा होती है. इस कारण इनके भी विवाह की परंपरा है. भोजपुरी अंचल में यह मान्यता है कि इससे कुएँ तथा बावलियों में भरपूर था मीठा जल बना रहता है. इन परंपराओं के पीछे उद्देश्य रहा होगा कि वृक्ष ही नहीं बल्कि प्रकृति के कई घटक नारी संसर्ग और स्पर्श चाहते हैं.

आज भारतीय समाज में दोहद रूपी लोक परंपरा का ह्रास देखने को मिल रहा है अब नारी, प्रकृति और वृक्षों की आकांक्षा को कम महत्व दिया जा रहा है. ज़रूरत है इस पर ध्यान देने की. इससे एक तरफ़ श्रेष्ठ वंश वृद्धि होगी, संतान स्वस्थ होंगे, सुंदर और कुशल होंगे, वहीं दूसरी ओर वृक्ष और पौधे भी फल-फूलों से लदकर देश का उत्पादन बढ़ाएँगे. तालाबों का भी अस्तित्व बना रहेगा. कुओं का जल मीठा और पीने योग्य होगा तथा उन का जलस्तर भी हमारे लायक़ बना रहेगा. अंततः हम सभी को इन सभी चीज़ों से लाभ होगा.

Monday, July 24, 2017

पौराणिक आख्यानों की ओर


पौराणिक आख्यानों में कई ऐसे दृष्टांत मिल जाते हैं जो आज के सन्दर्भ में भी प्रासंगिक लगते हैं.कहा जाता है कि प्राचीन भारतीय समाज में वर्ण व्यवस्था प्रचलित थी और साधारणतः इसमें परिवर्तन संभव नहीं था.लेकिन विश्वामित्र प्रतापी क्षत्रिय नरेश थे जिन्होंने अपनी तपस्या के बल पर ब्राह्मणत्व प्राप्त किया.जिस सविता देवी की स्तुति रूप गायत्री की दीक्षा उपनयन में दी जाती है उसके दृष्टा विश्वामित्र ही माने जाते हैं.

पुराणों के अनुसार विश्वामित्र कान्यकुब्ज देश के महीपति थे.एक बार वे सेना के साथ आखेट के लिए गए और शिकार करते हुए बहुत दूर निकल गए.भूख-प्यास से व्याकुल लौटते हुए एक जगह सुंदर आश्रम दिखा,पता चला यह महर्षि वशिष्ठ का आश्रम है.सेना को वहीँ छोड़ वे ऋषि के दर्शन हेतु उनके आश्रम जा पहुंचे.वशिष्ठ से कुशल क्षेम पूछने के बाद चलने को तत्पर हुए तो वशिष्ठ ऋषि ने उनसे आतिथ्य ग्रहण का अनुरोध किया.

विश्वामित्र को यह गर्वोक्ति लगी तो उन्होंने कहा कि उनके साथ विशाल संख्या में सैनिक भी हैं.वशिष्ठ ऋषि ने निवदन किया,क्या हानि है,पास ही पवित्र जल वाली नदी है.कम से कम उससे ठंढा जल तो सबको मिल ही जाएगा.भोजन के लिए भी जो हो सकेगा वह प्रबंध हो जाएगा.’

विश्वामित्र ने वशिष्ठ की उस उक्ति को गर्वोक्ति माना और विचार किया कि आज उनका अभिमान तोड़ ही देना चाहिए.प्रकट में कहा कि ऋषि की आज्ञा शिरोधार्य है,मैं सेना सहित आपका आथित्य ग्रहण करूंगा.’वशिष्ठ के शिष्यों ने प्रत्येक के लिए इच्छानुसार भोजन सामग्री प्रस्तुत कर दी साथ ही घोड़ों के केलिए भी यथोचित सामग्री प्रस्तुत की गयी.सभी लोगों के मन में विचार उत्पन्न हुआ कि इतना सुख तो अपने घरों में भी नहीं है.

भोजन आदि से निवृत्त होकर जब विश्वामित्र पुनः विदा मांगने वशिष्ठ के पास पहुंचे जब जिज्ञासा प्रकट की,’आश्रम तो छोटा प्रतीत होता है ,इतनी बड़ी सेना के लिए आथित्य का सामान कहाँ से आया.’वशिष्ठ ने अपनी गौ को ओर संकेत करते हुए कहा –‘भारतवर्ष का मुख्य धन तो यही गौ है.इस कामधेनु गौ की कृपा से ही यहाँ सब कुछ सुलभ है.’
विश्वामित्र ने कहा.’ऐसी अनुपम वस्तु का प्रयोग तो आप कभी-कभी ही कर पाते होगें,यह तो हमारे राजदरबार के उपयुक्त है.कृपया इसे हमें दे दीजिए.’वशिष्ठ ने कहा,’आप हमारे अतिथि हैं.अतिथि को उनकी इच्छानुसार सबकुछ दिया जा सकता है किंतु यदि यह गौ अपनी इच्छानुसार आपके साथ जाना चाहे तो इसे ले जा सकते हैं,इसके लिए बल प्रयोग नहीं होना चाहिए.’

महाराजा विश्वामित्र ने अपने सैनिकों को गौ ले चलने की आज्ञा दी किंतु गौ डकारते हुए वशिष्ठ के चरणों में बैठ गयी.वशिष्ठ ने कहा,’राजन, गौ जाना नहीं चाहती तो मैं बलात भिजने में असमर्थ हूँ.’इस पर विश्वामित्र आवेश में आ गए.उन्हों अपने सैनिकों को गौ को बांधकर ले जाने की आज्ञा दी लेकिन वशिष्ठ के तेज के कारण उनके समीप नहीं पहुँच सके.अंत में दिव्यास्त्रों का प्रहार शुरू कर दिया.

वशिष्ठ ने कोई उत्तर नहीं दिया केवल अपना ब्रह्मदंड लेकर खड़े हो गए.विश्वामित्र के दिव्यास्त्रों को ब्रह्मदंड निगल जाता था.यह देखकर विश्वामित्र ने अपना धनुष तोड़कर फेंक दिया उनके मुंह से निकल पड़ा.........

धिग् बलं क्षत्रियबलं ब्रह्मतेजो बलं वलम् |
एकेन ब्रह्मदण्डेण सर्वस्त्राणि हतानि में ||

विश्वामित्र ने निश्चय किया कि वे ब्रह्म्बल प्राप्त करेंगे.इस निश्चय के साथ ही वे ब्रह्म्बल की प्राप्ति के लिए तपस्या करने चले गए.उन्होंने ताप किया और ब्राह्मणत्व प्राप्त किया.एक क्षत्रिय के ब्राह्मणत्व प्राप्त करने पर भी वर्ण व्यवस्था पर कोई चोट नहीं पहुंची.यह वर्ण व्यवस्था के लचीलेपन का प्रमाण है.ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लेने पर भी कौशिक गोत्र में बने रहने कि सम्भावना व्यक्त की जाती है.विश्वामित्र का कौशिक नाम वेदों और पुराणों में मिलता है.

Monday, July 17, 2017

मृत्यु का देवता


दुनियां के प्रायः सभी देशों,सभी सभ्यताओं में प्राचीन आख्यानों और मिथकों की समुद्ध परंपरा रही है.ये आख्यान और मिथक एक तरह से मनुष्य के आध्यात्मिक और भौतिक विकास का इतिहास भी हैं.वे उन परिस्थितियों की ओर भी संकेत करते हैं,जिन्होंने मनुष्य की विचारधारा,उसके दृष्टिकोण,उसके जीवन को प्रभावित किया है.

कई देशों की लोककथाओं में मिथकों का व्यापक विस्तार और समानताएं भी देखने को मिल जाती हैं.भारतीय मिथकों और लोकगाथाओं में यमराज को मृत्यु का देवता माना जाता है.मिस्त्र की सभ्यता में ओसिरिस को मृत्यु का देवता माना जाता है.

प्राचीन मिस्त्र में यह विश्वास प्रचलित था कि मृत्यु के पश्चात प्रत्येक व्यक्ति को ओसिरिस के लोक में प्रवेश करना पड़ता  है,जहाँ उसके पाप-पुण्य का विचार किया जाता है.प्राचीन मिस्त्र की मूर्तिपूजक सभ्यता में भारत से कई गुणा अधिक देवी-देवताओं का आधिपत्य था.सूर्य देवता जिसे ‘रा’ कहा जाता था,मिस्त्र के देव-मण्डल का प्रमुख था.उसी ने स्वयं को बनाया था और उसके बाद सृष्टि की रचना की थी.

प्राचीन मिस्त्र के धार्मिक साहित्य में ‘रा’ की महिमा का वर्णन मिलता है लेकिन देवताओं में सर्वाधिक रोमांचक और विविध वर्णन ओसिरिस का है.ओसिरिस मृत्यु का देवता माना जाता था और मृत्यु के बाद जीवन की कल्पना जितनी गहराई से प्राचीन मिस्त्री आस्था और विश्वासों से जुड़ी हुई थी,उसे देखते हुए ओसिरिस को विशेष स्थान प्राप्त था.

ओसिरिस को लेकर एक रोचक मिथक प्राचीन मिस्त्र के धर्म लेखों में मिलता है.एक बार ‘रा’ को पता चला कि नुतृ और गेब नामक दो देवी-देवता एक दूसरे से प्यार करते हैं.’रा’ ने क्रोधित होकर ‘नुतृ’ को श्राप दिया कि वह वर्ष के किसी भी दिन संतान को जन्म नहीं दे सकेगी.

इस गंभीर समस्या का हल ‘थोत’ देवता ने निकाला.वह हर रोज थोड़ा-थोड़ा समय चुराकर रख लेता था.इस तरह चुराए हुए समय से उसने पांच दिनों का निर्माण किया.उन अतिरिक्त दिनों के दौरान नुतृ ने ओसिरिस,होरस,सेत,आइसिस और नेपथे को जन्म दिया.प्राचीन मिस्त्री लोग वर्ष के अंतिम पांच दिनों को इन्हीं नामों से जानते थे.नेपथे और सेत तथा ओसिरिस और आइसिस विवाह में बंध गए.

बाद में ओसिरिस मिस्त्र का राजा बन गया और देव समाज में उसे महत्वपूर्ण स्थान मिल गया.सेत ओसिरिस से ईर्ष्या करता था.एक बार ओसिरिस मिस्त्र से बाहर दूसरे देश की यात्रा पर गया.लौटने पर सेत ने उसके सम्मान में दावत दी. उसने ओसिरिस की लम्बाई के अनुसार एक सुंदर और मजबूत ताबूत बनवाया.दावत शुरू हुई तभी सेत के संकेत पर दास उस ताबूत को उठाकर लाए.सेत ने मुस्कुराकर कहा-‘मित्रो ! आओ एक खेल खेलते हैं.मुझे यह विचित्र संदूक उपहार में मिला है.हम सब बारी-बारी से इस संदूक में लेट कर देखें.’

खेल शुरू हुआ.ओसिरिस के अतिरिक्त बारी-बारी से हर व्यक्ति उस ताबूत में घुसा,किसी ने ताबूत को छोटा तो किसी ने बड़ा बताया.अंत में ओसिरिस की बारी आई.वह ख़ुशी-ख़ुशी ताबूत में जा लेटा.पलक झपकते ही ताबूत को बंद करके उसमें पिघला हुआ शीशा लगा दिया गया.सेत के घर के पास ही एक नदी बहती थी जिसके गहरे पानी में उसे फेंक दिया गया.

आइसिस को पता चला कि सेत ने उसके साथ क्या कर डाला है.रोती-कलपती वह हर आने-जाने व्यक्ति से पूछती कि क्या उसने नदी में बहते किसी ताबूत को देखा है?आखिर में दो बच्चों ने उसे बताया कि उन्होंने कुछ लोगों को एक ताबूत नदी में फेंकते हुए देखा था.

नदी में गिरने के बाद ताबूत समुद्र में पहुंचा और बहता हुआ लेबनान में बिबलास नगर के तट पर जा लगा.लहरें ताबूत को किनारे पर छोड़ गयीं.ताबूत कुछ पौधों में अटक गया.बाद में वहां एक विशाल वृक्ष उग आया जिसके तने में ताबूत छिप गया.

एक दिन बिबलास के राजा ने पेड़ को देखा तो उसे काटने का आदेश दिया.काटने के बाद शिल्पियों ने पेड़ के तने को एक स्तम्भ का रूप दे दिया.काष्ठ स्तंभ राजप्रासाद के एक कक्ष में छत को सहारा देने के लिए लगा दिया गया.ताबूत में बंद ओसिरिस का शव अब उस स्तंभ की कैद में था.आइसिस अपनी दैवीय शक्ति के बल पर पूरी घटना को जान गयी.वह बिबलास जा पहुंची और रानी की दासियों से मित्रता कर ली.आइसिस के शरीर से विचित्र सुगंध निकलती थी.दासियों के शरीर में भी वही सुगंध बस गयी.

उस विचित्र सुगंध से रानी आकर्षित हुई,दासियों से पूछा और आइसिस को महल में बुला भेजा.आइसिस ने रानी को जैसे सम्मोहित कर दिया था.उसने आइसिस को महल में बच्चे की देखभाल के लिए रख लिया.रात हुई.कक्ष में आग जल रही थी.आइसिस ने सोचा वह बच्चे को अमर बना दे.उसने बच्चे को पवित्र करने के लिए आग में डाल दिया और चिड़िया बनकर उस काष्ठ स्तंभ के चक्कर लगाने लगी जिसके अंदर उसके पति का ताबूत था.

उसी समय रानी कमरे में आयी तो बच्चे को आग में पड़ा देखकर आतंक से चीख उठी.आइसिस ने बच्चे को आग से निकाल लिया,बच्चा सकुशल था.उसने रानी को अपना वास्तविक परिचय दिया,कहा,’मुझे अपने पति की देह चाहिए.’रानी आश्चर्य से अभिभूत खड़ी रही.आइसिस ने स्तंभ को काटकर ताबूत बाहर निकला और ताबूत लेकर चली आयी.बाद में बिबलास ने आइसिस के सम्मान में विशाल मंदिर का निर्माण करवाया.

आइसिस पति का ताबूत लेकर मिस्त्र की ओर चल दी.वहां पहुचकर उसने ताबूत को खोला और ओसिरिस के निष्प्राण शरीर से लिपटकर विलाप करने लगी.फिर ताबूत को झाड़ियों में छिपाकर महल जा पहुंची.इस बीच सेत को भी साड़ी घटना मालूम हो चुकी थी.वह मौका देखकर गया और झाड़ियों में छिपा ताबूत उठाकर चल दिया.उसने ओसिरिस के अनेक टुकड़े कर दिए और मिस्त्र में दूर-दूर तक फेंक दिया.

आइसिस महल से बहन नेपथे के साथ लौटी तो ताबूत को न पाकर खोजबीन शुरू कर दी.दोनों ने ढूंढ़कर ओसिरिस के शरीर के टुकड़े इकठ्ठे किए और हर जगह अंतिम संस्कार करके ओसिरिस का एक मंदिर बना दिया.इस तरह ओसिरिस एक सर्वपूज्य देवता बन गया,मृत्यु का देवता.

Monday, July 10, 2017

खो गए बुलबुल के तराने

Indian Bloggers

कहा जाता है कि चिड़िया तो मनुष्य के बिना रह सकती है लेकिन मनुष्य चिड़ियों के बिना सूना महसूस करता है.चीन में चिड़ियों की कमी वहां के पर्यटकों को अत्यधिक महसूस होती है.सुबह तथा शाम यदि चिड़ियों का झुण्ड दिखाई न दे एवं उनका कलरव सुनाई न पड़े तो सूनापन महसूस होता ही है.

चिड़ियों के रूप-रंग,सौन्दर्य,विभिन्न प्रकार की गतिविधियाँ,आकर्षक उड़ान एवं मधुर गान से आनंद की अनुभूति होती है.घरेलू कौआ,गोरैया,मैना तथा बुलबुल जैसी चिड़िया जो आम थी अब शायद ही यदा-कदा दिखाई देती है.गानेवाली तथा बोलनेवाली चिड़ियों में बुलबुल,मालावार विस्लिंग,थ्रश,श्यामा,पहाड़ी मैना तथा तोता आदि चिड़ियों की भाषा सरल ध्वनियों तथा मुद्राओं के रूप में होती है.

मानव जीवन  में चिड़ियों की उपयोगिता समय-समय पर सिद्ध होती रही है.कीड़ों-मकोड़ों कृषि के विनाशक कीटों के सफाये में जहाँ इनका अमूल्य योगदान है वहीँ पनडुब्बी(डाइवर) कुल के बहुत से पक्षी परागण को एक फूल से दूसरे फूल तक ले जाने में सहायक होते हैं.पुष्प-पक्षी तो केवल मधुरस पर ही जीवित रहते हैं.चंदन का बीज मुख्यतः बुलबुल तथा वार्वेट पक्षियों द्वारा फैलाया जाता है.

अनेक देवी-देवताओं के वाहन पक्षी हैं.पतंजलि के युग में कौवों से संबंधित विज्ञान- वायुविद्या बहुत लोकप्रिय थी.सुदूर आकाश में स्वर्ग की सीमा के भीतर तक उड़कर पहुँचने की उनकी योग्यता के कारण ऐसा कहा जाता है कि कौवे अज्ञात सत्य तथा भविष्य को भी जान सकते हैं.

आयुर्वेद में पक्षियों द्वारा मनुष्यों को स्वास्थ्य लाभ कराने तथा प्राकृतिक संतुलन बनाये रखने हेतु आवश्यक माना गया है.वेदों,पुराणों,रामायण,महाभारत तथा संस्कृत के महाकाव्यों में विभिन्न पक्षियों का वर्णन मिलता है.अपने रंग-बिरंगे परों तथा पंखों,सुहावने रूप-रंग,विभिन्न प्रकार की उड़ानों और मधुर संगीत द्वारा पक्षियों ने कवियों का ध्यान आकर्षित किया है.

वर्षाकाल प्रारंभ होते ही मोर नाचने लगते हैं,तुलसीदास राम के मुख से कहवाते हैं.........

लछिमन देखहू मोरजन नाचत वारिद पेखि

वर्षाकाल के अंत होते ही खंजन पक्षी दिखने लगते हैं तुलसीदास ने इनका वर्णन किया है......

वर्षा विगत शरद ऋतु आई
लक्ष्मण देखहू परम सुहाई
जानि शरद ऋतु खंजन आए
पाई समय जिमि सुकृत सुहाए

कवि सुमित्रानंदन पंत ने पक्षियों के चहकने की नक़ल की है....

संध्या का झुट-पुट
वृक्षों का झुरमुट
चहक रही चिड़िया
ट्वी-टी-टुट- टुट

कवि निराला ने पक्षियों से प्रभावित होकर लिखा......

बड़े नयनों में स्वपन
खोल बहुरंगी पंख विहग से

यह विडंबना ही है कि विकास के पथ पर अग्रसर मानव समाज में अब पक्षियों के अस्तित्व पर चर्चा नहीं होती.कुछ पशु भले ही सामाजिक,राजनैतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हो गए हों लेकिन विकास का बाजारवाद पक्षियों के विलुप्त होते जाने पर चर्चा नहीं करता.हकीकत यही है कि भले ही हम उत्तरोतर आधुनिक होते जा रहे हैं,नयी तकनीक से गृहनिर्माण कर रहे हैं,कीटनाशकों का अंधाधुंध इस्तेमाल कर रहे हैं,हर दूसरे घरों की छतों पर मोबाईल के टावरों को बनने देते रहे हैं  लेकिन सामजिक जीवन में पक्षियों के अस्तित्व को भी नहीं नहीं नकारते.

किसी शायर ने वाजिब ही कहा है कि.........

आलम को लुभाती है पियानो की सदाएं
बुबुल के तरानों में अब लय नहीं आती 

Monday, July 3, 2017

यादें नई पुरानी

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मैथिली में एक कहावत है कि ‘एना कते दिन’ ,मतलब इस तरह कितने दिन.इस नाम से मैथिली में एक फिल्म भी बनी है. आलस्य में इस तरह कितने दिन बीत गए पता ही नहीं चला कि आखरी पोस्ट कब लिखी थी.एक तो व्यस्तता उस पर भी आलस्य हावी.इधर दो चार दिनों से ब्लॉग पर सक्रिय होने की काफी चर्चा चल पड़ी थी तो तय हुआ कुछ लिखना तो चाहिए ही.

इधर यू ट्यूब पर टहलते मेरे पसंदीदा अभिनेता शशि कपूर की कुछ वीडियो क्लिप दिखाई दी तो वही मासूम सा चेहरा आखों में तैर गया.’हसीना मान जाएगी’,प्यार का मौसम’,’कन्यादान’ सरीखी फिल्मों के अभिनेता का हालिया  तस्वीर तो काफी विचलित करने वाला था.

शायद यही वजह रहती होगी कि प्रमुख अभिनेता,अभिनेत्रियों में ढलते उम्र की तस्वीर मीडिया से बचाने की.फिर भी यदा कदा उनकी तस्वीरें सामने आती रहती हैं.कुछ महीने पूर्व दिवंगत अभिनेता विनोद खन्ना का अस्पताल से चित्र जारी हुआ था तो प्रशंसकों को गहरा धक्का लगा था.शायद इसी कारण से देव आनंद अपने अंतिम संस्कार विदेश में करवाना चाहते थे.

सभी अभिनेता,अभिनेत्री यह इच्छा रखते हैं कि वे ताउम्र जवां बने रहें ताकि प्रशंसकों में उनकी परदे वाली छवि बनी रहे और इस कारण इसी किस्म के रोल भी करते रहते हैं लेकिन मानव शरीर पर उम्र तो हावी रहती ही है. वे भूल जाते हैं कि मानव शरीर का दिन प्रतिदिन क्षरण होता रहता है.

प्रमुख अमेरिकन कवि हेनरी वड्सवर्थ लोंगफेलो कि एक कविता पढ़ी थी जिसमें कवि कहता है......

Dust thou art, to dust thou returnest
यह शरीर मिट्टी से बना है और मृत्यु के बाद मिट्टी में ही मिलना है.

सभी अभिनेता,अभिनेत्रियों के एक नहीं कई चेहरे होते हैं,पर्दे पर कुछ और तो वास्तविक जीवन में कुछ और.शायद व्यावसायिकता का तकाजा हो या दर्शकों में अपनी छवि बनाए रखने कि जुगत.इसी को दाग फिल्म में बड़ी खूबसूरती से शब्दों में पिरोया गया था...

जब भी चाहे नई दुनियां बसा लेते हैं लोग
एक चेहरे पे कई चेहरे लगा लेते हैं लोग 


दूरदर्शन पर कई बरस पहले एक धारावाहिक इसी कंसेप्ट पर आया था ‘चेहरे पर चेहरा’ जिसमें बांग्ला के प्रसिद्ध अभिनेता अनिल चटर्जी प्रमुख भूमिका में थे.मानव जीवन की विसंगति ही है किहर जगह हमें अलग-अलग चेहरों की जरूरत पड़ती है.


Thursday, February 23, 2017

एक लेखक का जाना

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एक लेखक का ख़ामोशी से जाना और कोई खबर नहीं बनना साहित्यिक जगत के लिए कोई नया नहीं है.पहले भी ऐसा कई बार हुआ है.साहित्यिक जगत तो फिर भी उसे लेखक मानने को तैयार न था.साहित्यिक जगत ने ही मेरठ से एक बड़ी तादाद में छपने वाले लेखकों और उपन्यासकारों की लेखनी को लुगदी साहित्य से नवाजा था.कारण इस तरह के लेखकों का साहित्य बेकार और रद्दी के कागजों,जिसे लुगदी कहा जाता था,पर छापा जाता था.

इम्तिहान के बाद के खाली समयों को उन दिनों इसी लुगदी साहित्य ने भरा था.कर्नल रंजीत तो फिर भी पुराने हो चुके थे लेकिन वेद प्रकाश शर्मा उन दिनों लिखना शुरू कर रहे थे.पहली बार उनका उपन्यास ‘अल्फांसे की शादी’ पढ़ा था.फिर एक बार जो पढ़ने का चस्का लगा तो उनके कई उपन्यास पढ़ डाले.'कैदी न. 100',’दहेज़ में रिवाल्वर’,’वर्दी वाला गुंडा’ तो काफी चर्चित हुआ.उन दिनों वेद प्रकाश शर्मा के अलावा वेद प्रकाश कम्बोज,कर्नल रंजीत,सुरेन्द्र मोहन पाठक का भी जासूसी उपन्यास में बोलबाला था.

हस्य,रोमांच भरे जासूसी उपन्यासों में वेद प्रकाश शर्मा का कोई जवाब नहीं था.देशी,विदेशी किरदार,परत दर परत खुलते राज,पाठकों को बांधे रखते थे.उन दिनों ये उपन्यास दो-तीन रूपये के किराए पर भी मिल जाते थे.हममें से बहुत से पाठकों ने इसी तरह उनके उपन्यासों को पढ़ा था. वेद प्रकाश शर्मा ने तकरीबन 176 उपन्यास लिखे और कुछ फिल्मों की स्क्रिप्ट भी लिखी.

उस दौर के उपन्यासकारों में जासूसी के अलावा रूमानी लेखकों का भी जलवा था.रानू,गुलशन नंदा से लेकर अन्य कई लेखकों ने पाठकों के दिलों में जगह बनायी.

समय बदला और लोगों की रूचि भी बदली. लोग अब नफासत पसंद लेखकों की बिरादरी की किताबों को ढूँढ़ने लगे थे.अब नाम ही काफी होता था,चाहे किताबें कैसी भी हों.इसी क्रम में हम सबने भी कई देशी,विदेशी लेखकों को पढ़ा.चेतन भगत से लेकर पाउलो कोएलो तक को खूब पढ़ा.चेतन भगत अब उत्सुकता नहीं जगाते.उनका नवीनतम उपन्यास ‘वन इंडियन गर्ल’ पिछले दो महीने से ज्यों का त्यों रखा है लेकिन अभी तक पढ़ने की इच्छा नहीं हुई.आज के दौर के कई लेखक बेस्टसेलर भले ही हों लेकिन आम लोगों की नब्ज पकड़ने में माहिर नहीं लगते.

अब भले जासूसी उपन्यासों का क्रेज ख़त्म हो चुका हो लेकिन अपने देश में जासूसी उपन्यासों की एक लंबी परंपरा रही है.इब्ने शफी,बी.ए. से लेकर वेद प्रकाश शर्मा तक लेखकों की एक कतार रही है और इस विधा के माहिर रहे हैं.लेकिन बदलते समय के साथ पढ़ने को लेकर भी लोगों की रुचियाँ बदली हैं और लोग अब गंभीर किस्म के साहित्य को या ज्यादा नामी-गिरामी  लेखकों को पढ़ने में ज्यादा रूचि लेने लगे हैं.

साहित्य भले ही बदल गया हो और अब गंभीर किस्म के साहित्य को ज्यादा तवज्जो मिलने लगा हो लेकिन पढ़ने के शुरूआती दौर के लोकप्रिय उपन्यासकार हमेशा हम जैसे पाठकों के जेहन में रहेंगे.