Wednesday, January 11, 2017

अफ़साने और भी हैं

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आज के इस वैज्ञानिक युग में निरंतर रहस्यपूर्ण खोजें होती रही हैं और आगे भी होती रहेंगी.प्रतिदिन के समचार पत्र नित नयी खोजों और अध्ययनों से भरी रहती हैं.21वीं सदी में भी हम अपने आसपास नजर डालते हैं तो पाते हैं कि ऐसी कई चीजें हैं जिनके बारे में हम कुछ नहीं जानते और फिर उनकी जानकारी देने वाला साहित्य हमारे सामने आता है.यह भी विरोधाभास है कि जितनी जानकारी हमारी बढ़ती जाती है,उतना ही महसूस होता है कि हम कुछ नहीं जानते.

इस विरोधाभास का फायदा उठानेवालों की भी कमी नहीं है.जालसाजियाँ,धोखाधड़ियाँ इसलिए होती रहती हैं, क्योंकि हमें उसके बारे में कुछ पता नहीं होता.जालसाज हमारे अज्ञान को भुनाकर अपनी जेबें भरते हैं.लेकिन ताज्जुब तब होता है जब विशेषज्ञ माने जाने वाले लोग भी जालसाजी करने से बाज नहीं आते.

प्रत्येक वैज्ञानिक क्षेत्र के अनेक उपक्षेत्र भी बन गए हैं.हर क्षेत्र में विशेषज्ञता आ गयी है.हर क्षेत्र की अपनी भाषा है.एक तरफ जहाँ ज्ञान-विज्ञान में प्रगति हो रही है वहीं अंधविश्वास,रहस्यवाद तथा नीमहकीमी भी बढ़ रही है.इन बातों ने हर युग के वैज्ञानिकों को परेशान किया है.

वैज्ञानिक खुद भी लोगों को भ्रमित कर सकते हैं.इस बात का प्रमाण अनेक घटनाओं  से मिला है.चार्ल्स डॉसन इंग्लैंड के एक सम्मानित मानवशास्त्री खास तौर पर जीवाश्मशास्त्री थे.लोग उनकी उपलब्धियों के लिए उनकी कद्र करते थे.1932 में पिल्टडाउन के निकट  एक गड्ढे से उन्होंने एक खोपड़ी और निचले जबड़े के कुछ टुकड़े खोज निकाले. खोपड़ी काफी सख्त थी और मानवीय खोपड़ी जैसी ही लगती थी.जबड़ा भी मानव के आकार का था.जबड़ा, हालांकि आदिम था और खोपड़ी काफी विकसित.फिर भी दोनों चीजें एक दूसरे में सटीक बैठती थीं.

यह वह समय था जब वैज्ञानिक डार्विन के विचारों के ठोस साक्ष्य तलाशने में लगे हुए थे.उन्हें ऐसे ही किसी साक्ष्य का इंतजार था.प्रख्यात जीवाश्मशास्त्री तथा ब्रिटिश म्यूजियम के संग्राहक स्मिथ वुडवर्ड ने डॉसन के पिल्टडाउन मानव को ‘इयोएन्थ्रोपस डॉसोनी’ नाम दिया और उसका चित्रांकन भी किया.

डॉसन खुद वुडवर्ड को उस स्थल पर ले गए थे,जहाँ पिल्टडाउन मानव की खोज हुई थी.उनके बाद अन्य जीवाश्मशास्त्री भी उस स्थल को देखने गए.प्रख्यात जासूसी लेखक सर आर्थर कानन डायल ने भी उस स्थान का दौरा किया.उन दिनों वे अपनी पुस्तक “The Lost World” लिख रहे थे.

डॉसन ने पिल्टडाउन में एक अन्य स्थल की खोज भी कर डाली,जहाँ से उन्होंने तथा उनके साथियों ने अनेक नए साक्ष्य भी खोज निकाले.कुछ अनगढ़ किस्म के औजार,एक अन्य खोपड़ी के कुछ अंश अन्य जानवरों के अवशेष आदि.इन सभी खोजों से यह प्रमाण मिलता था कि इंग्लैंड में 10 और 20 लाख साल पहले मानव रह रहा था.

डार्विन विकासवादी थे.उन्होंने विकास को धीमी प्रक्रिया के रूप में चित्रित किया था. डॉसन की खोज ने मानो डार्विन के सिद्धांत को पुख्ता आधार प्रदान कर दिया था. डॉसन की खोज को लोगों ने ‘विलुप्त कड़ी’ के साक्ष्य के रूप में स्वीकार कर लिया.अगले 43 वर्षों तक किसी विद्वान ने इस पर अंगुली नहीं उठायी.

1955 में ब्रिटिश म्यूजियम ने इन जीवाश्मों से संबंधित एक रिपोर्ट प्रकाशित की.फ्लोरीन की मात्रा के परीक्षण से पता चला कि खोपड़ी पचास हजार वर्ष से ज्यादा पुरानी नहीं है और जबड़ा तो आधुनिक ही है.रासायनिक परीक्षणों से यह पता चला कि जबड़े पर इस तरह के धब्बे लगा दिए गए थे कि वह प्राचीन जैसा नजर आए.

जबड़े के दांतों को रेती से रेता गया था.एक्सरे से यह भी पता चला कि उन दांतों की जड़ें किसी चिम्पांजी या ओरांग के दांतों की तरह लंबी हैं.यानी किसी चिम्पांजी या ओरांग के जबड़े को जानबूझकर इस तरह का रूप देने की कोशिश की गयी थी कि वानर और मानव के बीच का लगे.यह काम किसके द्वारा किया गया था इसका आज तक पता नहीं चला.हालांकि जे.एस. बीनर ने अपनी पुस्तक ‘द पिल्टडाउन फोर्जरी’ में यह संकेत दिया है कि यह जालसाजी खुद डॉसन द्वारा की गयी थी.

प्रख्यात अमेरिकी लेखक डैन ब्राउन का उपन्यास Deception Point भी इसी तरह की वैज्ञानिक धोखाधड़ी से संबंधितहै.उनका कथानक नासा की पृष्ठभूमि में है.अमेरिका में राष्ट्रपति के चुनाव होने वाले हैं और नासा के लगातार विफल मिशन के कारण उसके बजट में भरी कटौती कर दी जाती है.निवर्तमान राष्ट्रपति नासा के समर्थक हैं जबकि चुनाव  में उनके प्रतिद्वंदी नासा के भारी-भरकम बजट के आलोचक  हैं और लोगों के सामने इसकी विफलताओं को पेश करते रहे हैं.

नासा के वैज्ञानिक नासा और निवर्तमान राष्टपति की गिरते साख को बचाने के लिए एंटार्कटिका में बर्फ के कई फीट नीचे एक रहस्मय चट्टान के मिलने का दावा करते हैं जो एक करोड़ वर्ष पुरानी और दूसरे ग्रह से आई प्रतीत होती है.नासा के वैज्ञानिकों की साख फिर से बढ़ जाती है और दुनियां भर के तमाम वैज्ञानिक इसकी जांच-पड़ताल में जुट जाते हैं.जांच में कई नए तथ्य मिलते हैं जो बताते हैं की यह चट्टान मानव निर्मित है और इसे प्रयोगशाला में बनाकर एंटार्कटिका में बर्फ में ड्रिल कर काफी नीचे दबा दिया गया था.

डैन ब्राउन के अन्य उपन्यासों की तरह ही इसमें भी रहस्य,रोमांच का ताना-बाना है जो यही बताते हैं की वैज्ञानिक बिरादरी में भी धोखाधड़ी और जालसाजी आम बात है.

Thursday, January 5, 2017

कुछ रंग इनके भी


फ़िल्मी गीत,संगीत से इतर कुछ गीत,नज्म क्या दिल के करीब हैं आपके? जाहिर है,हममें से बहुतों के होंगें.कई गीत,नज्म जो किसी फिल्म के हिस्सा नहीं बने लेकिन हम सब के दिलों के बहुत करीब हैं और जेहन में बसते हैं.

जानी बाबू और युसूफ आजाद काफी बड़े कव्वाली गायक रहे हैं.लेकिन जानी बाबू का एक नज्म जो बहुत चर्चित नहीं हो सका वह मेरे दिल के बहुत करीब है....

खिलौनों की बारात गुड़ियों की शादी
तेरा शहजादा मेरी शहजादी
तुझे याद हो या न हो लेकिन
मुझे याद आते हैं बचपन के वो दिन

मुझे मोहित चौहान तबसे पसंद रहे हैं जबसे 90 के दशक में उनके बैंड सिल्क रूट का एलबम बूँदें निकला था.
इसका एक गीत तो मुझे आज भी बहुत पसंद है.....

डूबा-डूबा रहता हूँ
आँखों में तेरी
दीवाना बन गया हूँ
चाहत में तेरी

उषा उथुप भी मेरी पसंदीदा गायिका रही हैं और कई बार उनका लाईव शो भी देखा है.जब वे स्टेज पर रहती हैं पूरी तरह छाई रहती हैं और दर्शकों,श्रोताओं से संवाद बनाने में माहिर हैं.एक गीत जो कुछ अन्य बांग्ला गायिकाओं ने भी सुरों से नवाजा है लेकिन उषा उथुप की आवाज में खूब फबते हैं.....

आहा तुमि सुंदरी कोता.....
कोलकाता

उषा उथुप का 80 के दशक में एक एलबम आया था जिसके गीत हालांकि ज्यादा चर्चित नहीं हुए लेकिन वे अपने स्टेज शो में अक्सर गाती रही हैं.....

आज मेरे घर आयेंगे साजन
छम छम नाचूंगी मैं
छोड़ो जी छोड़ो मेरा आंचल
बाली उमर है अभी मेरी
शरमा जाउंगी हाय मैं घबरा जाउंगी

चंदन दास काफी लोकप्रिय गजल गायक रहे हैं और उनकी गजलें मुझे भी बहुत पसंद हैं लेकिन 90 के दशक में दूरदर्शन पर प्रसारित धारावाहिक ‘फिर वही तलाश’ में बशीर बद्र के लिखे और चंदन दास की सुरों से सजे गजल आज भी मुझे चंदन दास के सबसे उम्दा गजल लगते हैं......

मेरे हमसफ़र मेरे साथ तुम 
सभी मौसमों में रहा करो  

फिर इसका टाइटिल गीत .......

कभी हादसों की डगर मिले
कभी मुश्किलों का सफ़र मिले
ये चिराग हैं मेरी राह के,
मुझे मंजिलों की तलाश है

Saturday, December 31, 2016

भुला नहीं देना जी भुला नहीं देना

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हम हिन्दुस्तानियों को पुरानी चीजों से खासा लगाव होता है.इन चीजों या उपकरणों पर मरम्मत में इसकी वास्तविक कीमत से ज्यादा खर्च कर बैठते हैं लेकिन इसे सहेज कर रखने की आदत होती है.बदलते वक्त के साथ तकनीक का पुराना होते जाना आम बात है लेकिन कभी पुराने तकनीक को दिल से जुदा करने का गम भी सालता रहता है.

संगीत प्रेमियों में ऑडियो कैसेट सहेज कर रखना आम बात होती थी.लेकिन सी.डी,डी.वी.डी ,एम.पी.3 उसके बाद ब्लू रे डिस्क जैसी नई तकनीकों के आने से ऑडियो कैसेटों की मांग नहीं के बराबर रह गई है.कभी कितने जतन से इन कैसेटों को सहेज कर रखा था.आज अचानक ही एक कार्टून में बंद पड़े कैसेटों पर नजर गई तो पुरानी स्मृतियाँ ताजा हो आईं.

गजल के कई संग्रह को तो काफी खोजबीन के बाद ख़रीदा गया था,जगजीत-चित्रा सिंह,भूपेन्द्र-मिताली मुखर्जी,राजकुमार-इन्द्राणी रिजवी,राजेन्द्र मेहता-नीना मेहता,चंदन दास,पंकज उधास,मखमली आवाज के मालिक तलत अजीज़,अहमद हुसैन-मो.हुसैन साहब के गजल की बात ही कुछ और थी.भूपेन्द्र-मिताली के 'राहों पे नजर रखना,मंजिल का पता रखना,आ जाए कोई शायद,दरवाजा खुला रखना', कई-कई बार सुना था.

अहमद हुसैन-मो.हुसैन साहब को पहली बार रेडियो पर सुना था.तब भागलपुर रेडियो स्टेशन से शाम के सवा सात बजे गजलों का कार्यक्रम आता था जिसमें हुसैन बंधु का गजल खूब बजता था.हुसैन साहब आज भी मुझे प्रिय हैं.खासकर उनका यह गजल - 'ऐ सनम तुझसे में जब दूर चला जाऊँगा,'सावन के सुहाने मौसम में' या फिर 'मैं हवा हूँ,कहाँ वतन मेरा' मेरे प्रिय गजल रहे हैं.

राजेन्द्र मेहता-नीना मेहता के गजल भी खूब लोकप्रिय रहे हैं.खासकर 'एक प्यारा सा गाँव,जिसमें पीपल की छांव' आज भी बड़े शौक से सुने जाते रहे हैं.मनहर का गजल पहली बार कई साल पहले एक सुबह धनबाद के बस स्टैंड पर बज रहे कैसेट के एक दुकान में सुनकर ख़रीदा था.हाल में जब उस बस स्टैंड पर जाना हुआ तो पाया वहां पर अब एक मोबाईल का दुकान खुल गया है.तक़रीबन कैसेट के लगभग सभी दुकानों में नए बोर्ड लग गए हैं.अब काफी कोजने पर ही कैसेट का दुकान दिखाई देता है.नई तकनीक का यह साइड इफ़ेक्ट लगता है.

वैसे काफी पहले से ही मोबाईल,लैपटॉप,डेस्कटॉप आदि ने संगीत उपकरणों की जगह लेनी शुरू कर दी थी,रही सही कसर इंटरनेट पर मौजूद गीतों,गजलों के  भरपूर संग्रह ने पूरी कर दी. आने वाले समय में तकनीक का और विस्तार हो सकता है लेकिन संगीत प्रेमियों के लिए संगीत का खजाना तब भी बदस्तूर मौजूद रहेगा.

आज जब इन कैसेटों पर नजर जाती है तो लगता है ये कह रही हों.........

भुला नहीं देना जी भुला नहीं देना 
जमाना ख़राब है दगा नहीं देना